Saturday, May 16, 2009

क्या ढूँढ रहे हो

अपने लिए औरो में अहदे वफ़ा ढूँढ रहे हो
दीवाने हो तुम यह क्या,और कहाँ ढूँढ रहे हो 

       आज के दौर में हर सर पे ज़ख़्म,हाथ में पत्थर है
       शीशा-ए-दिल लिए अपना यहाँ क्या ढूँढ रहे हो 

बीज नफ़रत के बोने में सब है मसरूफ़ यहाँ
इस गुलशन में कहाँ अमन की पौध ढूँढ रहे हो 

      जो आने वाला है कल मौसम,शुमार में उसे रखो
      कल जो बीत गया,क्या उस में बहार ढूँढ रहे हो 

तब रोज़ मुलाकात की खातिर दोनो वक़्त चुरा लाते थे
अब दीदार के लिए भी,फ़ुर्सत के लम्हे ढूँढ रहे हो 

      हर आँख की किस्मत में दो एक टूटे सपने होते है
     गर्दिश-ए-दौरा में तुम,कहाँ खुश्क आँख ढूँढ रहे हो 

यह महकती बस्ती,गुलों के कद्रदानो की है बस्ती
कांटो भरा दामन लिए,तुम खरीदार ढूँढ रहे हो


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